Desk:-बिहार विधानसभा की तैयारी जोरों पर है. चुनाव में टिकट पाने के लिए कई युवा नेता से लेकर दिग्गज नेता अलग अलग हथकंडे अपना रहे हैं. कोई जातीय समीकरण को फिट करने में लगा है तो कोई सामाजिक समीकरण को ठीक करने में लगा है. पूरे बिहार में किस सीट पर किसको टिकट मिलेगा ये अभी से तय तो नहीं है लेकिन अपनी दावेदारी सुनिश्चित करने के लिए जमीन पर उतर कर कई नेता तरह तरह के लॉलीपॉप जनता के बीच बांटने में मशगूल हैं. ऐसे में बरबीघा में क्या चल रहा है इस बात पर भी पटना से लेकर बरबीघा के राजनैतिक गलियारों में कई नामों की चर्चा खूब हो रही है.
आये दिन एक बात का जिक्र होते रहता है कि राजा का बेटा राजा बनेगा. उदाहरण के तौर पर किसी बड़े नेता का नाम लिए बगैर यह तो समझा जा सकता है कि अधिकतर बड़े नेता के पुत्र या पुत्री होने के नाते टिकट लेना आसान है और पार्टी से टिकट मिलने पर जीत मिल ही जाती है. यदा कदा ही किसी बड़े नेता के संतान को हार नसीब होती है लेकिन टिकट मिलने के पहले और जीतने के बाद शायद ही ऐसे नेता जनता के दुलारे हो पाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जनता के बीच रहने वाला ही हमारा नेता बनेगा और ऐसे नेता ही काम के होते हैं. अब भूमिका से बाहर निकलकर एक युवा डॉक्टर की चर्चा करना बेहद जरूरी है.
नाम है डॉ ऋषभ. पिता हैं पटना के विख्यात डॉक्टर सहजानंद बाबू. अब सवाल ये उठता है कि डॉ ऋषभ की कहानी क्यों की जा रही है. बरबीघा में ऐसा इन्होंने क्या कर दिया है. सच कहें तो ना तो सवाल जटिल है ना ही जवाब जटिल है.पिछले 2 साल से देखें तो बरबीघा की फिजा बदल गई है.स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉ ऋषभ ने कुछ ऐसा कर दिया जो अच्छे अच्छे डॉक्टर नहीं कर पाए हैं. हालांकि बरबीघा में कई अच्छे डॉक्टर हैं और बहुत ही बढ़िया काम भी कर रहे हैं. बरबीघा में ऐसे सभी डॉक्टर को जनता भगवान भी मान रही है लेकिन कोई युवा डॉक्टर एसी वाले कमरे से निकलकर गांव गांव जाकर लोगों का फ्री में इलाज कर रहे हैं तो ऐसे डॉक्टर को अनायास ही सलाम करने का दिल करता है. यही वजह है कि बरबीघा के लोगों के दिलों में डॉ ऋषभ ने घर बना लिया है.
पिछले एक साल में बरबीघा, तेउस, शेखोपुरसराय, मेंहुस इत्यादि जैसे जगहों पर जाकर एक सिस्टेमैटिक तरीके से करीब 1000 बुजुर्ग पुरूषों-महिलाओं के आंख का ऑपरेशन करवा चुके हैं. वहीं तकरीबन 8 हजार लोगों की अलग अलग जटिल बीमारियों का फ्री में इलाज भी करवा चुके हैं और यह जानकर भी ताज्जुब होगा कि इस काम के लिए पटना से 20 से 25 डॉक्टर की पूरी टीम के साथ यह काम इन्होंने किया है. कहते हैं ना पूत सपूत धन संचय काहे, पूत कपूत धन संचय काहे. सच कहे तो इस मामले में डॉ सहजानंद बाबू इस मामले में काफी सौभाग्यशाली है. क्योंकि डॉ ऋषभ इलाज तो कर ही कर ही रहे हैं साथ ही बिना भेदभाव किए जिस गांव में जाते है वहीं किसी भी घर में जाकर खाना भी खाते हैं और आजतक इसकी कोई मार्केटिंग भी नहीं की.
क्योंकि नेताओं में हाल के दिनों में ये शगल काफी देखने को मिल जाता है. एक तस्वीर सामने निकल कर सोशल मीडिया में तैरने लगती है फलाने नेता जी ने इस गरीब के घर आज भोजन किया. साफ तौर पर कह सकते हैं कि इस मामले में डॉ ऋषभ सच में गरीबों के बीच जाकर उनका सुख दुख बांट रहे हैं.चुनाव आने में वक्त है. बरबीघा विधानसभा सीट से किस पार्टी से किस चेहरे को टिकट मिलेगी ये कहना मुश्किल है लेकिन किसी भी पार्टी के लिए सबसे सफल चेहरा डॉ ऋषभ हैं. क्योंकि आज के दौर में नाच करवा देना, मीट भात खिला देना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन किसी के दुख को दूर करना सबसे बड़ी जनसेवा है.
ऐसे कई उदाहरण बरबीघा में देखने को मिला है जब डॉ ऋषभ ने खुद आगे बढ़कर कई गरीब लोगों को पटना में सफल इलाज किया है और स्पष्ट कहा भी है चाचाजी पैसा के लिए सोचना नहीं है. ऐसे युवा तुर्क को बरबीघा से टिकट कोई भी पार्टी देती है तो ये बरबीघा के लिए सौभाग्य है.